मध्यप्रदेश के अनोखे मेले : कहीं दूसरे खेमे को हराने के लिए चलते हैं आग के गोले तो कहीं झंड़ा उतारने के लिए पत्थर
मेला जहां लोग अलग-अलग जगहों से आकर एक-दूसरे से मिलते हैं। मेले हमारे भारत की पहचान हैं जिनका मतलब है कल्चरल एक्टिविटी। हम सभी कभी न कभी मेला गए होंगे। मेले ढेर सारी अलग-अलग चीजें देखी होंगी। मेले में रोजमर्रा के सामान से लेकर मौत के कुएं का खेल भी देखने को मिलता है। ये मेले किसी कारण या किसी त्योहार की वजह से आयोजित किये जाते हैं। भारत समेत एमपी में अलग-अलग मेलों का आयोजन किया जाता है। एमपी के कुछ मेले ऐसे हैं जो हमें कहीं और देखने को नहीं मिलते हैं। आइये जानते इन्हीं अनोखे मेलों के बारे में...
हिंगोट युद्ध और मेला : इस मेले में दो समूहों एक-दूसरे पर फेंकते हैं आगे के गोले
स्थान - गौतमपुरा, इंदौर
हिंगोट युद्ध और मेला दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस युद्ध में दो समूह बनाये जाते हैं जिनमें कल्गी और तुर्रा होते हैं। ये दोनों समूह एक-दूसरे पर जलते हुए हिंगोट फेंकते है। हिंगोट एक किस्म का जंगली फल होता है जिसे नारियल के खोल में बारूद के साथ तैयार किया जाता है। दोनों समूह एक-दूसरे पर हिंगोट फेंकते हैं लेकिन बचने के लिए हर व्यक्ति के हाथ में ढाल भी होती है। हर योद्धा के पास हिंगोट से भरा हुआ एक थैला होता है और सिर पर पगड़ी होती है। यही थैला निशाना बनाया जाता है।
लोक कथा के हिसाब से इस मेला को मानने के पीछे मुगलों से बचने के लिए अभ्यास था। मुगलकाल में लोग इस तरह से हिंगोट का उपयोग करके खुद की रक्षा किया करते थे।
- गोटमार मेला : जहां झंडे को उतारने के लिए नदी के दोनों ओर से चलते हैं पत्थर
स्थान -पांढुर्णा, छिंदवाड़ा
गोटमार मेला अनोखा मेला है। ये मेला छिंदवाड़ा जिले के पांढुर्णा में जाम नदी के किनारे मनाया जाता है। इसे भारतीय महीने भाद्रपद अमावस्या के दिन मनाया जाता है। एक लंबे पेड़ को नदी के बीच में एक झंडे के साथ खड़ा किया जाता है। सावरगांव और पांढुर्णा गांव के निवासी नदी के दोनों किनारों पर इकट्ठा होते हैं। एक-दूसरे के गांव के लोगों पर पत्थरों से वार करते हैं। इस पथराव के पीछे कारण सामने वाले गांव के लोगों को झंडा ले जाने से रोकना है। जिस गांव का निवासी झंडा हटाने में सफल होता है, उसे विजयी माना जाता है।
पांढुर्णा में चंडी देवी का मंदिर है जिन्हें आस्था में रखकर इस मेले को मनाया जाता है।
- भगोरिया हाट : युवाओं का अनोखा प्रणय उत्सव
स्थान - झाबुआ, अलीराजपुर
होली के समय भगोरिया हाट का उत्सव मनाया जाता है। तीन दिनों तक मनाया जाने वाला ये उत्सव भीलों को प्रमुख त्योहार है। भगोरिया हाट को तीन दिनों तक मनाया जात है जिसमें पहला दिन संजारिया , दूसरा भगोरिया और आखिरी उजारिया होता है। इस मेले में दूसरा दिन सबसे प्रसिद्ध है। इस मेले के बीचोंबीच मलखंभ लगाया जाता है। इस खंभे पर युवक, युवतियों को रिझाने के लिए सफल प्रयास करते हैं जो सफल होता है। सफल होने वाला युवक युवती के परिवार के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है। जब विावह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो पान खिलाया जाता है।
इस मेले की रौनक ही युवक-युवतियों के रंग-रंगीले साज-सजीले व्यवहार से है। लड़के-लड़कियां एक दूसरे को पसंद करते हैं तो एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं या तंबाखू खिलाते हैं। प्रणय उत्सव के अलावा इस मेले की रौनक आदिवासी भील संस्कृति की पहचान है। रोजमर्रा की चीजों से लेकर संस्कृति की विरासत भी देखने को मिलती है। भगोरिया हाट विदेश में आकर्षण का केंद्र है।
ग्वालियर मेला : ऐसा मेला जहां सिलाई के सुई से लेकर ट्रक भी बिकता है
स्थान - ग्वालियर
ग्वालियर मेला भारत के अनोखे मेले में से एक है। इस मेले की शुरुआत साल 1905 में माधवराव सिंधिया ने की थी। 104 हेक्टेयर में लगने वाले इस मेले में शिल्प बाजार, इलेक्ट्रॉनिक बाजार, फूड जोन आदि होते हैं। यहां पशुओं का बाजार भी लगता है जहां देश भर की नस्ल के पशु बिकने के लिए आते हैं। इस मेले की पहचान यहां लगने वाला वाहनों का बाजार है जहां ट्रक तक बिकने के लिए आते हैं। यहां ब्रांड की बात की जाए तो बीएमडब्ल्यू , मर्सिडीज जैसे ब्रांड अपना इंफोर्मेशन सेंटर खोलते हैं।
हीरामन बाबा मेला : जहां हीरामन बाबा के आशीर्वाद से बांझपन दूर होता है
स्थान - ग्वालियर, गुना
हीरामन बाबा का नाम ग्वालियर और इसके आस-पास के क्षेत्रों में प्रसिद्ध है। यह कहा जाता है कि हीरामन बाबा के आशीर्वाद से महिलाओं का बांझपन दूर होता है। कई सौ वर्षों पुराना यह मेला अगस्त और सिंतबर में आयोजित किया जाता है।
नागाजी का मेला : बंदरों के लिए लगने वाला अनोखा मेला
स्थान : मुरैना
अकबर कालीन संत नागाजी की स्मृति में यह मेला लगता है। मुरैना जिले के पोरसा गांव में एक माह मेला चलता है। पहले यहाँ बंदर बेचे जाते थे। अब सभी पालतू जानवर बेेचे जाते हैं।
BY_vinaykushwaha
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