जबलपुर : मार्बल रॉक का शहर जहां नर्मदा नदी के किनारे देखने को मिलते हैं अलग-अलग रंगों के मार्बल
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| धुआंधार फॉल्स, भेड़ाघाट , जबलपुर |
जबलपुर एमपी का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। टूरिज्म के लिए पॉपुलर डेस्टिनेशन में से जबलपुर अपने नेचुरल और ऐतिहासिक जगहों के लिए जाना जाता है। जबलपुर को सिटी ऑफ मार्बल रॉक के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा नदी किनारे स्थित आध्यात्म की बयार हो या कचनार सिटी में स्थित शिव की विशाल प्रतिमा सबकुछ बेमिसाल है। करोड़ों साल से 10 इंच जगह पर टिकी 40 टन की चट्टान हो या पहाड़ी पर स्थित मदन महल से शहर को निहारना आश्चर्य से भरा है। नर्मदा नदी पर बने बरगी डैम से लेकर डुमना नेचर पार्क हो या नर्मदा नदी में नौका विहार करते हुए अलग-अलग रंगों की मार्बल रॉक को निहारना अद्वितीय है। आइए देखते हैं जबलपुर में और कुछ खास क्या है...
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| धुआंधार फॉल्स के पास स्थित चौंसठ योगिनी मंदिर |
चौंसठ योगिनी मंदिर
भारत विश्व के उन देशों में से एक है जहां मूर्तिकला और स्थापत्यकला का विकास साथ-साथ हुआ। भारत में बड़े-बड़े महलों से लेकर मंदिर तक बेमिसाल कारीगरी के नमूने हैं। पत्थरों से बने मंदिर और मूर्तियां कई हजारों साल से भारत की पहचान रही है। एक ऐसा ही मंदिर है एमपी के जबलपुर में जिसका नाम है चौंसठ योगिनी मंदिर।
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| चौंसठ योगिनी मंदिर का बाहरी हिस्सा |
चौंसठ योगिनी मंदिर देखकर तो लगता है कि आज का संसद भवन का मैप इसे ही देखकर तैयार किया गया था। इस मंदिर का आकार वृत्ताकार है। इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए दो द्वार हैं जो पूर्व और पश्चिम दिशा में हैं। मंदिर में प्रवेश करने के बाद वृत्ताकार संरचना में चौंसठ योगिनी की प्रतिमा स्थापित हैं। इस मंदिर की एक सबसे बड़ी खासियत है कि वृत्ताकार संरचना में स्थापित प्रत्येक मूर्ति 81 डिग्री का कोण बनाती है।
मंदिर के बिल्कुल बीचोंबीच एक मंदिर है जिसमें शंकर-पार्वती की प्रतिमा नंदी पर विराजमान है। यह कल्चुरीकालीन स्थापत्यकला का अद्भुत नमूना है। बलुआ पत्थर पर बारीक कारीगरी करके मंदिर को बनाया गया है। मंदिर ज्यादा आकर्षक नहीं है लेकिन इसका इतिहास कई कहानियां बयां करता है। इस मंदिर का निर्माण कल्चुरी राजा युवराजदेव प्रथम ने 10वीं शताब्दी में करवाया था। इस मंदिर में गुप्त और कुषाण काल की प्रतिमाएं भी स्थापित की गईं हैं। आज कई मूर्तियां जीर्ण-शीर्ण अवस्था में दिखाई देती हैं। ऐसा कहा जाता है मुगल राजा औरंगजेब के आदेश पर मंदिर की मूर्तियों में तोड़फोड़ की गई थी।
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| चौंसठ योगिनी मंदिर : चौंसठ योगिनी में से एक योगिनी की मूर्ति |
सौ फुट ऊंची पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक जाने के लिए जो सीढ़ियां दिखाई देती हैं वे भी कई सौ साल पुरानी हैं। यह मंदिर कभी तांत्रिक गतिविधि का केंद्र हुआ करता था। इस मंदिर को गोलकीमठ के नाम से भी जाना जाता था। इस मठ को विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल था। यहां ज्योतिष, गणित, तंत्र-मंत्र आदि की शिक्षा दी जाती थी। इस मंदिर की सबसे रोचक बात ये है कि भले ही इस मंदिर का नाम चौंसठ योगिनी मंदिर है लेकिन यहां योगिनियों की 81 प्रतिमाएं स्थापित हैं।
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| तिलवारा घाट : नर्मदा नदी के किनारे स्थित फेमस घाटों में से एक |
तिलवारा घाट
जबलपुर की लाइफलाइन नर्मदा नदी के किनारे कई सारे घाट बने हुए हैं जो अपनी-अपनी कहानी बयां करते हैं। नर्मदा नदी के किनारे तिलवारा घाट अपना एक अलग ही इतिहास बयां करता है। तिलवारा घाट का नाम नर्मदा नदी के किनारे स्थित तिल भांडेश्वर मंदिर के कारण हुआ है। यहां मकर संक्रांति के त्योहार पर मेला भी लगता है।
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| नर्मदा नदी पर स्थित तिलवारा घाट ब्रिज |
तिलवारा घाट हमें इतिहास का आईना भी दिखाता है। यहां लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने आजादी से पहले लोगों को इसी घाट केे समीप संबोधित किया था। महात्मा गांधी ने जबलपुर की तीन बार यात्रा की थी। एक बार उन्होंने तिलवारा घाट का दौरा भी किया था।
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| गांधी स्मारक : तिलवारा घाट के पास में स्थित |
महात्मा गांधी के स्वर्गवास के बाद उनकी अस्थियों का विसर्जन इसी घाट पर किया गया था। इसी घाट के पास बना गांधी स्मारक महात्मा गांधी के अहिंसा की याद दिलाता है। इस स्मारक का निर्माण एमपी के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने करवाया था|
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| कमानिया गेट : शहर के बीचोंबीच स्थित कांग्रेस के त्रिपुरी सम्मेलन का स्मारक |
कमानिया गेट
देश की सबसे पुरानी पार्टी में से एक कांग्रेस पार्टी का संबंध जबलपुर से रहा है। साल 1939 की बात है जब कांग्रेस का अधिवेशन जबलपुर में हुआ। इस अधिवेशन को त्रिपुरी अधिवेशन के नाम से जाना जाता है। अधिवेशन में कांग्रेस के दिग्गज नेता शामिल हुए जिनमें महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, बी पट्टाभि सीतारम्मैया आदि थे।
अधिवेशन में अध्यक्षता के लिए चुनाव हुआ जिसमें सुभाषचंद्र बोस ने बी पट्टाभि सीतारम्मैया को पराजित किया। सीतारम्मैया गांधीजी की पसंद थे और चाहते थे कि वे ही जीतें। सीतारम्मैया की हार को महात्मा गांधी ने अपनी हार कहा था। यह सब सुभाषचंद्र बोस को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया।
इस अधिवेशन की याद में शहर के बिल्कुल बीचोंबीच स्मारक का निर्माण करवाया गया। इसे जबलपुर में कमानिया गेट के नाम से भी जानते हैं। ये स्मारक हमें सदैव त्रिपुरी अधिवेशन के किस्से को याद कराता रहेगा। ये गेट शहर के मुख्य बाजार में स्थित है जिसे बड़ा फुहारा के नाम से जाना जाता है।
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| कचनार सिटी : भारत की सबसे विशाल शिव प्रतिमाओं में से एक |
जबलपुर को अविस्मरणीय जगहों के लिए जाना जाता है। यहां मैं जिस जगह की बात कर रहा हूं वो जबलपुर को भारत में चुनिंदा जगह बनाती है। जबलपुर की कचनार सिटी में स्थित हैं भारत की सबसे बड़ी शिव प्रतिमा में से एक। कचनार सिटी में भगवान शिव की 76 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा को देखकर लगता है कि मानो दुनिया की सारी वस्तुएं बौनी नजर आ रही हैं। भगवान शिव के चेहरे का भाव देखकर लगता है कि नदी का शांत ठहरा पानी हो। प्रतिमा सच में आश्चर्यचकित करने वाली है।
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| बैलेंसिंग रॉक : मदन महल के पास स्थित |
बैलेंसिंग रॉक, जबलपुर
क्या कभी आपने किसी चट्टान को दूसरी चट्टान पर टिके हुए देखा है? क्या कभी आपने 40 टन वजनी चट्टान को 10 इंच जितनी जगह पर टिके हुए देखा है? जबलपुर की बैलेंसिंग रॉक(Balancing Rock) इसका बेहतरीन उदाहरण है। प्रसिद्ध मदन महल किले के पास जाने कितने ही सालों से बैलेंस का एक शानदार प्रतीक है बैलेंसिंग रॉक।
नौका विहार के साथ-साथ रंगीन मार्बल का नजारा
जियोलॉजिस्ट(Geologist) के अनुसार बैलेंसिंग रॉक लगभग 5 करोड़ साल पुरानी है। ये रॉक ग्रेनाइट से बनी हुई है। इन सब के अलावा इस रॉक ने कई भूकंप(Earthquake) झेले हैं। जबलपुर नर्मदा फॉल्ट लाइन पर स्थित है जहां भूकंप आते रहते हैं। साल 1997 में रिक्टर स्केल पर 6.2 तीव्रता का भूकंप आया था जिसने जबलपुर को हिलाकर रख दिया था लेकिन इसके बावजूद बैलेंसिंग रॉक अपनी जगह से हिला तक नहीं। बैलेंसिंग रॉक तुस्सी ग्रेट हो।
मदन महल
जबलपुर का इतिहास स्वर्णिम रहा है। मौर्य, गुप्त, सातवाहन, कल्चुरि शासन तक के प्रमाण मिलते हैं। इसके सबके अलावा यहां गोंड वंश के शासकों का शासन कई सौ सालों तक रहा। गोंड वंश के शासन के समय की बहुत सारी रचनाएं जबलपुर में हैं जो समृद्ध शासन व्यवस्था की झलक दिखाती है। मदन महल किला इसी गोंड वंश के शासन का साक्षात गवाह है। जबलपुर में 500 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है मदन महल। मदन महल को अब रानी दुर्गावती किला के नाम से भी जानते हैं।
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| मदन महल : इसे 12वीं शताब्दी में मदन शाह ने बनवाया था |
इस किले का निर्माण गोंड शासक मदन शाह ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। ये महल कोई बहुत बड़ा नहीं है और ना ही इसमें कोई भव्यता है लेकिन संरचना इसे महत्वपूर्ण(Important) बनाती है। महल एक ओर से पूरी तरह एक बड़ी सी चट्टान पर टिका हुआ है। महल दोमंजिला है जिसकी ऊपरी मंजिल में दो छोटे-छोटे कमरे हैं। इस महल की छत से दूर तक फैले जबलपुर को देखेंगे तो वाह कहने से खुद को रोक नहीं पाएंगे।
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| मदन महल के सामने स्थित खंडहर |
दरअसल मदन महल गोंड शासकों के लिए एक वॉर रूम था जिसे वे वॉच टॉवर की तरह इस्तेमाल करते थे। इस महल के परिसर में अस्तबल, स्नानागार, बावड़ी आदि आज भी मौजूद है। इस महल का उपयोग शाही यात्राओं के लिए भी किया जाता था।
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| ग्वारीघाट : नर्मदा नदी किनारे स्थित पवित्र घाट |
ग्वारीघाट
नर्मदा नदी के किनारे स्थित सबसे पवित्र घाटों में से एक है ग्वारीघाट। ऐसी मान्यता है कि इस घाट पर गौरी ने तपस्या की थी इसलिए इस घाट घाट को ग्वारीघाट के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि पहले इसका नाम गौरीघाट था जो बिगड़ते हुए ग्वारीघाट हो गया। घाट पर आकर आस्था की डुबकी तो लगा सकते हैं साथ ही साथ शांति भी महसूस कर सकते हैं। ग्वारीघाट में रामलला मंदिर, जानकी मंदिर और गौरी कुंड भी है।
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| गुरुद्वारा ग्वारीघाट साहिब : ग्वारीघाट के दूसरे किनारे पर स्थित |
ग्वारीघाट के बाएं तट पर ग्वारीघाट साहिब है जो सिखों का पवित्र तीर्थ स्थल है। भारत भ्रमण के दौरान गुरु नानक देव जबलपुर आए थे और इसी जगह पर रुके थे। ऐसी मान्यता है कि यहीं गुरु नानक देव ने ऋषि सरबंग का उद्धार किया था और ठगों(Thugs) को सही मार्ग पर लेकर आए थे। इस घाट की पवित्रता दो धर्मों का प्रतीक बन गई है।
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| देवी त्रिपुर सुंदरी : तेवर में स्थित प्राचीन कालीन मंदिर |
त्रिपुर सुंदरी मंदिर
त्रिपुर सुंदरी मंदिर केवल एक मंदिर ही नहीं बल्कि इतिहास का जीता जागता सबूत है। इस मंदिर का निर्माण कल्चुरि वंश के प्रसिद्ध राजा कर्णदेव ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। मंदिर में त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमा विराजमान है। यहां पहले तांत्रिक गतिविधियां (Tantric Activities) होती थी। ये मंदिर भेड़ाघाट जाते समय आता है।
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| हनुमान ताल : जैन और हिंदू धर्म के मंदिरों का स्थल |
हनुमानताल जैन मंदिर
जबलपुर शहर के बीचों बीच स्थित है हनुमानताल जैन मंदिर। सफेद संगमरमर से बने इन मंदिरों की नींव 1686 एडी(AD) में पड़ी थी। यहां कुल 22 मंदिर हैं। ये मंदिर इसलिए भी महत्व रखते हैं क्योंकि ये स्वतंत्र अवस्था में भारत का सबसे बड़ा जैन मंदिर है। यहां भगवान आदिनाथ की कल्चुरीकालीन प्रतिमा स्थापित है। यहां मुगलकालीन और मराठों के समय की काफी मूर्तियों और सामान का संग्रह है।
पढ़ावली : चंबल का अनमोल और छुपा हुआ खजाना
मंदिर में माता पद्मावती की मूर्ति भी स्थापित है। माता पद्मावती की पूजा जैन धर्म में मध्य भारत में मुख्य रूप से की जाती है। मंदिर के बिल्कुल सामने एक बड़ा सा ताल है जिसे हनुमानताल के नाम से जाना जाता है। आकार में चौकोर ये ताल तीन धर्मों को समेटे हुए है जो मानो कह रहा हो कि सभी धर्म शांति के लिए हैं।
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| शंकरशाह -रघुनाथशाह स्मारक |
शंकरशाह रघुनाथशाह स्मारक
जबलपुर जंक्शन से कुछ सौ मीटर की दूरी पर शंकरशाह रघुनाथशाह का स्मारक है। ये स्मारक दोनों के बलिदान को अमर बनाता है। शंकरशाह रघुनाथशाह पिता-पुत्र थे और महारानी दुर्गावती के वंशज। जो दुर्गावती का वंशज हो वो भला गुलामी कैसे सहन कर सकता है? शंकरशाह ने एक कविता लिखी जिसे वे अक्सर गुनगुनाया करते थे। उनकी कविता से लोगों में देशभक्ति का भाव जगता था लेकिन अंग्रेजों की 52वीं रेजीमेंट के अधिकारी क्लार्क को ये पसंद नहीं आया। उसने इसे देशद्रोह कहा और अपने गुप्तचरों की मदद से पिता-पुत्र को बंदी बना लिया। उसने पिता-पुत्र को तोप के मुंह में बांधकर उड़ा दिया। आज भी गोंडवाना की धरती उनकी वीरता की कायल है कि उन्होंने अंग्रेजों की एक भी शर्त मानने से इंकार कर दिया।
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| पिसनहारी की मढ़िया : जबलपुर का सबसे फेमस जैन तीर्थ |
पिसनहारी की मढ़िया
मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध जैन तीर्थों में से एक है पिसनहारी की मढ़िया। यह एक दिगंबर जैन मंदिर है। कहा जाता है कि एक वृद्धा मंदिर का निर्माण करवाना चाहती थी लेकिन उसके पास रुपये ना होने के कारण वो मंदिर नहीं बनवा सकी। वृद्धा ने हाथ चक्की से अनाज पीसकर रुपये कमाए और उस धन से मंदिर बनवाया। इसलिए इस जगह को पिसनहारी की मढ़िया कहा जाता है। इस मंदिर परिसर में 14 मंदिर हैं। मंदिर पहाड़ी पर स्थित हैं। यहां से जबलपुर को निहारना आंखों को सुकून देता है।
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| बरगी डैम : नर्मदा नदी पर बने सबसे बड़े डैम में से एक |
बरगी डैम
जबलपुर में घूमने के लिए एक और शानदार जगह है बरगी डैम। जबलपुर से 30 किमी स्थित ये डैम वाटर एक्टिविटी को बढ़ावा देता है। डैम के किनारे खड़े होकर लगता है कि आप किसी समुद्र के नजदीक हो। यहां बोट राइड, फिशिंग, वाटर स्कूटर आदि की सुविधा भी है, जिससे बरगी डैम की यात्रा और भी मनोरंजक बन जाती है। इतना ही नहीं, डैम के आसपास के क्षेत्रों में मैना, तोता, सारस, कबूतर और स्थानीय काली गौरेया सहित अनेक पक्षियों को भी देखा जा सकता है।
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| रानी दुर्गावती म्यूजियम |
रानी दुर्गावती म्यूजियम
रानी दुर्गावती के नाम पर जबलपुर में म्यूजियम की स्थापना 1964 में की गई । इस म्यूजियम में जबलपुर और आस-पास का इतिहास मूर्तियों, कलाकृतियों, मुद्राओं(Coins), शिलालेखों से प्रदर्शित किया गया है। यहां मौर्यकाल से लेकर गोंड के समय तक की सामग्रियों को प्रदर्शित किया गया है। इन सबसे अलग यहां एक आदिवासी वीथिका है जिसमें जबलपुर अंचल के आदिवासी परिवेश को प्रदर्शित किया गया है। इस वीथिका(Gallery) में गोंड और बैगा जनजाति के जीवन को बताया गया। इसके अलावा रानी दुर्गावती के जीवन को प्रदर्शनी के माध्यम से दर्शाया है।
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| डुमना नेचर पार्क, जबलपुर |
डुमना नेचर पार्क
जबलपुर नेचर के करीब बसा हुआ शहर है। जहां पहाड़ी, तालाब, जंगल, नदी, संगमरमर के पहाड़ हैं। जबलपुर का डुमना नेचर पार्क जो बहुत से जानवरों का बसेरा है। यहां हाथी, चीतल, हिरण, बारहसिंगा, जंगली सुअर, नीलगाय आदि हैं। यहां एक सर्प उद्यान(Snake Park) और बटरफ्लाई पार्क भी है। यहां पर्यटकों के लिए ढेर सारे आकर्षण स्थल(Attraction Points) हैं जिनमें साइकिलिंग ट्रेक, फिशिंग प्वाइंट, सेल्फी प्वाइंट, टॉय ट्रेन आदि है। यहां लगभग 15 किमी लंबा साइकिलिंग ट्रैक है। डुमना नेचर पार्क के पास ही खंदारी लेक है जहां पर्यटक(Tourist) बोटिंग भी कर सकते हैं।
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| भंवरताल गार्डन , जबलपुर |
भंवरताल गार्डन
भंवरताल गार्डन शहर में स्थित एक सामान्य गार्डन जैसा दिखता है लेकिन है नहीं। यहां लगा मौलिश्री का पेड़ ओशो ट्री के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है इसी पेड़ के नीचे ओशो रजनीश को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यहां ओशो के अनुयायी आज भी ध्यान लगाने आते हैं। इसके अलावा यहां फाउंटेन, वॉचिंग टॉवर, ट्रेल, ओपन एयर ओडिटोरियम है। इस गार्डन के बीचोंबीच हाथी पर सवार रानी दुर्गावती की प्रतिमा स्थापित की गई है।
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| संग्राम सागर , जबलपुर |
संग्राम सागर
शहर की 52 ताल-तलैया में एक संग्राम सागर भी है। इसका निर्माण गोंड राजा संग्राम शाह ने करवाया था। तीन ओर से पहाड़ियों से घिरी झील आंखों को सुकून और आनंद से भर देती है। इस झील के बीचोंबीच एक वॉचिंग टॉवर भी बना हुआ है। इस झील के एक तरफ प्रसिद्ध बाजनामठ मंदिर है। यह मंदिर अपनी तांत्रिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। दूसरी तरफ एक पार्क है जो एक पहाड़ी पर स्थित है।
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| बरेला स्थित रानी दुर्गावती का समाधि |
रानी दुर्गावती समाधि स्थल
इंग्लिश की एक कहावत है Last but not the least मतलब है कि आखिरी है लेकिन किसी से कम नहीं है। जबलपुर से 24 किमी दूर नर्रई गांव है जहां स्थित है रानी दुर्गावती की समाधि स्थल। इसे नर्रई नाला के नाम से भी जाना जाता है। यहीं युद्ध लड़ते हुए रानी दुर्गावती को वीरगति प्राप्त हुई थी। ये मात्र जगह नहीं है ये सीख देने वाली जगह है। कैसे अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए तन-मन-धन न्यौछावर किया जाता है। रानी दुर्गावती का जीवन और उनसे जुड़ी हर जगह यही सीख देती हैं।
खानपान : जबलपुर के कुंदे का पेड़ा, फलाहारी घट पट और मावा जलेबी है सबसे खास
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| मावा जलेबी : जबलपुर की फेमस डिश |
जबलपुर विविधता के मामले में भारत के संपन्न शहरों में से एक है। चाहे ऐतिहासिक जगह हो या प्राकृतिक, सांस्कृतिक हो या मॉर्डन जबलपुर में इन सबका मेल है। खानपान के मामले में जबलपुर किसी शहर से कम नहीं है। जबलपुर में वैरायटी ऑफ फूड उपलब्ध है। जबलपुर के खाने में सारे स्वाद हैं चाहे खट्टा हो या मीठा, चाहे नमकीन हो या तीखा। सुबह के ब्रेकफास्ट से लेकर रात के खाने तक सब कुछ अलग है।
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| कुंदे का पेड़ा : जबलपुर की अनोखी स्वीट डिश |
जब भी आप जबलपुर जाएं तीन पत्ती चौराहे पर पोहे खा सकते हैं। यहां एमपी के दूसरे शहरों से थोड़ा अलग होता है जिसमें आलू की स्लाइस काटकर डाली जाती है जो आपको हटकर टेस्ट और टेक्सचर देता है। ब्रेकफास्ट में पोहे के अलावा मंगोड़े या जबलपुर की भाषा में बोले तो मुंगोड़ी का स्वाद ले सकते हैं। मुंगोड़ी, मूंग की दाल से बनती है जिसमें गरम मसाला, नमक, हरी मिर्च, बेसन,हरी धनिया, जीरा पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है। मुंगोड़ी को कुरकुरी बनाने के लिए पालक का उपयोग किया है। मुंगोड़ी का ऐसा स्वाद पूरे भारत में कहीं और चखने को नहीं मिलेगा। मुंगोड़ी को यहां हरी चटनी के साथ परोसा जाता है जिसका स्वाद चार गुना बढ़ा देता है।
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| मुंगौड़ी |
जबलपुर की जो सबसे स्पेशल डिश है मावे या खोवे की जलेबी। यहां की मावे की जलेबी बहुत मशहूर है। आप जब कभी जबलपुर जाएं तो मावे की जलेबी जरूर खाएं। जबलपुर में कमानिया गेट के पास बड़कुल वाले की दुकान की मावे की जलेबी स्वाद के नेक्स्ट लेवल पर ले जाती है। बड़कुल के समोसे और कचौड़ी भी लाजबाब होते हैं।
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| फलाहारी गटपट : भारत की सबसे अनोखी डिश |
कभी आपने टमाटर गटपट, फलाहारी गटपट जैसी डिश के बारे में सुना है? नहीं, तो मैं आपको बताता हूं कि गटपट क्या है? टमाटर गटपट, फलाहारी गटपट एक तरह की चाट है जिसमें प्याज और लहसुन का उपयोग नहीं किया जाता। फलाहारी में आलू से बनी चाट होती है जिसमें सिंघाड़े का सेव, मूंगफली और साबूदाने का उपयोग किया जाता है। इसी तरह टमाटर गटपट में आलू की जगह टमाटर ले लेता है। सबसे अलग और शानदार डिश है एक बार जरूर टेस्ट कीजिएगा।
जबलपुर की एक ऐसी स्वीट डिश जिसकी मांग शहर से बाहर भी है। उस का नाम है कुंदे का पेड़ा। कुंदे का पेड़ा बहुत स्वादिष्ट रहता है और बहुत ही मुलायम। ये पेड़े मुंह में रखते ही घुल जाते हैं। इस पेड़े का नाम कुंदे का पेड़ा रखने पीछे इसे बनाने का कारण है। इस पेड़े को बनाते समय अन्य पेड़े के मुकाबले ज्यादा देर तक फैंटा जाता है। यही कारण है कि इसे कुंदे का पेड़ा कहा जाता है।
इसके अलावा यहां रबड़ीवाला दूध, लच्छेदार रबड़ी, राजकचौड़ी लजीज और जायकेदार व्यंजन हैं।
त्योहार और भाषा : जबलपुर मेंं होता हैै बुुंदेली और बघेली बोली मिलन, नर्मदा जयंती और शरद पूर्णिमा महोत्सव हैं खास त्योहार
| ग्वारीघाट पर नर्मदा आरती |
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| नर्मदा नदी को चुनरी अर्पित करते हुए |
जबलपुर एमपी का तीसरा और भारत का 40वां सबसे बड़ा शहर है। गोंड शासनकाल (gond regime) में ये गोंडवाना में आता था। इसे महाकौशल प्रांत(Mahakaushal state) के नाम से भी जाना जाता है। जबलपुर में हिंदी भाषा बोली जाती है। बघेलखंड(Baghelkhand) और बुंदेलखंड (Bundelkhand) के बीच बसे होने के कारण यहां दोनों बोली(Dialects) मतलब बघेली और बुंदेली की छाप साफ-साफ दिखाई देती है।
इन दोनों बोली के मिलने से एक नई स्थानीय बोली बनी है जिसे यहां जबलपुरिया(Jabalpurian) बोली कहा जाता है। यहां के लोगों को जबलपुरिया कहा जाता है।
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| मदन महल से जबलपुर का खूबसूरत नजारा |
जबलपुर घूमने के लिए बेस्ट टाइम
जबलपुर में गर्मी के मौसम में पारा 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और बारिश जोरदार होती है। बारिश अच्छी होने के कारण पहाड़ी हरी-भरी हो जाती है और नर्मदा नदी उफान पर होती है। इसी कारण ठंड का मौसम घूमने के लिए शानदार है। इसलिए जब भी आप जबलपुर जाएं तो अक्टूबर से मार्च तक के महीने में ही जाएं।
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| ओशो ट्री : भंवरताल स्थित मौलश्री पेड़ के नीचे ओशो को ज्ञान प्राप्त हुआ |
बटेश्वर मंदिर समूह : भारत का ऐसा मंदिर समूह जिसके पुनर्निर्माण में डाकू ने दिया योगदान
जबलपुर से नजदीकी कई टूरिस्ट प्लेस हैं जिनमें अमरकंटक, तामिया, भैंसाघाट, संग्रामगढ़, बिलहरी, बहोरीबंद, मैहर, पचमढ़ी, श्रीधाम, डमरू घाटी, मंडला, बांधवगढ़ नेशनल पार्क, कान्हा नेशनल पार्क, जीवाश्म नेशनल पार्क डिंडौरी, भीमगढ़ डैम, सिवनी।
जबलपुर के बारे में अनोखी बात (AMAZING FACT ABOUT JABALPUR)
- जबलपुर का नाम जाबालि ऋषि के नाम रखा गया है। यहां नर्मदा नदी के किनारे जाबालि ऋषि ने तपस्या की थी।
- जबलपुर में स्थित वर्ल्ड फेमस भेड़ाघाट का नाम भृगु ऋषि के नाम पर रखा गया है। भेड़ाघाट के पास ही नर्मदा नदी के तट पर भृगु ऋषि ने तपस्या की थी।
- जबलपुर को 52 ताल-तलैयों का शहर कहा जाता है। पूरे जबलपुर में ताल-तलैया स्थित हैं। इन ताल-तलैयों का संबंध इतिहास से है। रानी दुर्गावती के नाम पर रानीताल, रानी दुर्गावती की सखी चेरी के नाम पर चेरीताल, रानी दुर्गावती के सेनापति आधार सिंह के नाम पर आधारताल, संग्राम सिंह के नाम पर संग्राम सागर ताल स्थित हैं। इनके अलावा हनुमानताल, फूटाताल, हाथीताल, सूपाताल, गुलौया ताल आदि हैं।
- जबलपुर के पाटबाबा पहाड़ी से डायनासोर के अंडे पाए गए हैं। ये डायनासोर मांसाहारी प्रवृत्ति के थे। इनका नाम राजासॉरस रखा गया है।
- जबलपुर, नर्मदा नदी किनारे स्थित सबसे बड़ा शहर है और एमपी का इंदौर और भोपाल के बाद सबसे बड़ा शहर है।
- जबलपुर नगर निगम बिल्डिंग जिसे ब्रिटिश टाइम पर टाउन हॉल के नाम से जाना जाता था । साल 1923 में भारत में पहली बार झंड़ा सत्याग्रह का गवाह बना।
- जबलपुर को संस्कार की राजधानी भी कहा जाता है। भूदान आंदोलन के समय विनोबा भावे जब जबलपुर आये तो यहां के रहवासी का आदर सत्कार देख उन्होंने इसका नाम संस्कारधानी रखा।
- जबलपुर स्थित कटंगा का टीवी टॉवर भारत के सबसे बड़े टीवी टॉवर में से एक है जो शहर के लगभग हर कोने से दिखाई देता है।
एयरपोर्ट :- जबलपुर एयरपोर्ट को डुमना एयरपोर्ट के नाम से जाना जाता है। जबलपुर भारत के कई बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है जिसमें दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, इंदौर, भोपाल शामिल हैं।
रेलवे स्टेशन :- जबलपुर जंक्शन एक बड़ा रेलवे स्टेशन है और पश्चिम मध्य रेलवे का मुख्यालय है। यहां से देश के कोने-कोने के शहरों के लिए ट्रेन उपलब्ध है।
बस स्टैंड :- जबलपुर में अंतर्राज्यीय(Interstate) बस स्टैंड है। इस बस स्टैंड से राज्य के दूसरे शहरों और महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी और छत्तीसगढ़ के लिए बस उपलब्ध हैं।
जरूर एक बार संगमरमर की नगरी को देखने जाएं और शहर को जी कर देखें।
📃BY_vinaykushwaha
































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