आर्ट इचौल : आर्ट और आर्ट लवर्स के लिए जन्नत
चांद बावड़ी : दुनिया की सबसे गहरी और पुरानी बावड़ी जहां बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है
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| खपरैल कोठी, आर्ट इचौल |
जब भी गांव के बारे में ख्याल आता है तो मन में एक तस्वीर उभरकर आती है कि कच्ची सड़क होगी, सड़क पर आवारा जानवर होंगे और अधनंगे बच्चे सड़क पर जानवरों के पीछे दौड़ लगा रहे होंगे। सड़क किनारे घरों के बाहर बने चबूतरों पर लोग गप्पे लगा रहे होंगे या किसी पेड़ के नीचे लोगों की चौपाल लगी होगी। छानी वाले कच्चे घर होंगे जिस पर पक्षी चहचहा रहे होंगे और सामान्य आदमी की लंबाई से कम ऊंचे दरवाजे से निकलता व्यक्ति अपने खेत की ओर जा रहा होगा। खेत की लहलहाती फसल में किसान या तो पानी दे रहा होगा या खाद या खेत में घुस आए आवारा जानवर को डंडे से भगाने के जतन कर रहा होगा।
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| ब्रिक टेंपल, आर्ट इचौल |
गांव की शांत और शांति को तोड़ने वाला कोलाहल दोनों मौजूद होता है। बस ये शहर के कोलाहल से थोड़ा अलग होता है । इन सब के बीच मैं कहूं कि भारत के गांव की इस विशेषता के बावजूद एक गांव ऐसा है जहां कला बसती है। कला भी इस तरह जहां वेस्ट मटेरियल से लेकर पत्थर से कला का एक नया रूप तैयार किया जाता है। मैं बात कर रहा हूं मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्थित आर्ट इचौल (ART ICHOL) की।
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| बाल शिवा, आर्ट इचौल |
आर्ट इचौल जिस सड़क के किनारे स्थित है इसके दोनों छोर पर दो ऐतिहासिक शहर हैं। एक छोर पर ऊंचेहरा जिसे इतिहास उच्चकल्प के नाम से जानता है। उच्चकल्प के राजाओं ने कई सालों तक इस शहर को अपनी राजधानी बनाकर राज किया। ऊंचेहरा को पीतल धातु (Brass Metal) के काम के लिए जाना जाता है। दूसरे छोर पर स्थित है मैहर। इस शहर की कई खासियत हैं पहली ये कि यहां शारदा देवी का मंदिर, दूसरा इस शहर को जाना जाता है संगीत के महान सम्राट पद्मविभूषण बाबा अलाउद्दीन खान के लिए । बाबा अलाउद्दीन खान ने मैहर बैंड की स्थापना की थी।
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| चट्टान पर उगे कुकुरमुत्ते के समान मानव मुख |
आर्ट इचौल इन दोनों के शहरों के बीच अपनी पहचान बनाए हुए है। पहचान ही नहीं बल्कि कला के क्षेत्र में इसने भारत में नया कीर्तिमान स्थापित किया है। हाइवे के किनारे स्थित आर्ट इचौल कई सारी कलाकृतियों (Artifacts) का घर है। इस आर्ट विलेज को स्थापित करने का श्रेय सूरज सभरवाल और उनकी बेटी अंबिका बेरी को जाता है।
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| स्टील के पेड़ पर लगीं पत्तियां , आर्ट इचौल |
इस आर्ट विलेज में पत्थर, मैटल, ईंट, वेस्ट मटेरियल, मिट्टी की ढेर सारी कलाकृतियां देखने को मिलती हैं। कई कलाकृतियां खुले आकाश में हैं तो कई सारी बेशकीमती कलाकृतियां खपरैल कोठी में हैं। चट्टान पर उगे कुकुरमुत्ते की तरह इंसान हों या शांति का संदेश देते बुद्ध सब कुछ अलग अंदाज में है। कलाकृतियों का साथ निभाते पेड़ भी मौजूद हैं। स्टील से बना पेड़ों का समूह हो या कबाड़ से बना म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट सब कुछ अनोखा है।
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| खपरैल कोठी में दीवार पर लगे अलग-अलग मीटर, आर्ट इचौल |
हर कलाकृति अपने साथ एक कहानी को लिए हुए है। महात्मा बुद्ध के द्वारा बंदर को श्राप देने की कहानी भी है जिसे एक साधु ने बाद में श्राप मुक्त किया था। इस आर्ट विलेज में जिसे बताया गया एक सुंदर से आर्टिफेक्ट के माध्यम से। मानो ऐसा लगता है कि बंदर अभी जीवित हो उठेगा। अटैची से संघर्ष की गाथा हो या नेचर का संघर्ष सबकुछ बिना किसी गाइड के साफ-साफ दिखलाई पड़ता।
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| श्रापमुक्त बंदर, आर्ट इचौल |
यहां नये का पुराने से मिलन भी होता है। पुरानी बघेलकालीन छत्री में फाइन आर्ट से तराशी गई शिवलिंग हो या बावड़ी (Stepwell) का अस्तित्व बनाये रखना। सब कुछ एक से बढ़कर एक है। आम के पेड़ के नीचे बैठकर आराम फरमाते और सितार पर तान छेड़ते बाबा अलाउद्दीन बिल्कुल जीवंत दिखाई पड़ते हैं।
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| म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंंट की झांकी, आर्ट इचौल |
खपरैल कोठी जो बाहर से देखने पर बिल्कुल गांव और शहर के मेल की तरह है जहां तेज लाइट में दिमाग की नई उपज की कलाकृतियां हैं। हजारों कलाकृतियां जिनमें काशी के घाट को छोटे से नमूने में प्रदर्शित करना हो या पुराने पड़े सैकड़ों मीटर को एक बोर्ड पर सजाकर एक नया जीवन देना हो या ट्रैफिक लाइट को नया कलेवर देना हो या सेरेमिक से बनी नई-नई कलाकृतियां हों। खपरैल कोठी की एक-एक कलाकृति शानदार और जानदार है। इसे इस तरह कहा जा सकता है बेमिसाल है।
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| खपरैल कोठी के अंदर रखीं विभिन्न कलाकृतियां |
आर्ट इचौल एमपी की ही नहीं भारत की शान है। यहां केवल कलाकृतियों से ही लोगों का मन मोहा जाता है बल्कि यहां लाइव एक्जीबिशन भी होता है फिर चाहे वह पोटरी हो या पेटिंग हो या कोई दूसरी कला की नुमाइश। आर्ट इचौल में खेती से जुड़ी बारीकियां करीब से देखी जा सकती हैं। सीजन के हिसाब से फसलों को बोया जाता है। आर्ट इचौल सच में सृजन करने वाला और संरक्षक दोनों है।
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| गौतम बुद्ध की कलात्मक प्रतिमा, आर्ट इचौल |
यहां भारत के विभिन्न कोने से कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए आते हैं। इसके अलावा विदेशों से फेमस कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन के लिए आते हैं। थाइलैंड, कोरिया, यूरोपियन देशों से आने वाले इन कलाकारों की कलाकारी आर्ट इचौल में देखी जा सकती है।
आर्ट इचौल से जुड़ा वीडियो यहां देखें
BEST TIME TO VISIT
आर्ट इचौल वैसे तो सभी मौसम में घूमा जा सकने वाला टूरिस्ट प्लेस है। ठंड के मौसम में आर्ट इचौल घूमने के लिए बेहतरीन है। गुलाबी ठंड में कलाकृतियों का आनंद लिया जा सकता है। हरियाली का आनंद लेने के लिए आप यहां बारिश के मौसम में भी आ सकते हैं।
NEAREST FAMOUS TOURIST PLACE
आर्ट इचौल से नजदीकी ढेर सारे टूरिस्ट प्लेस हैं जिनमें मैहर, रामवन, धारकुंडी, चित्रकूट, मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी, बांधवगढ़ नेशनल पार्क, पूर्वा फॉल, चचाई फॉल, बिहटा फॉल, रीवा , भरहुत स्तूप हैं।
HOW TO REACH ART ICHOL
बस - आर्ट इचौल से नजदीकी बस स्टैंड मैहर जो मात्र 9 किमी है। यहां से बड़े शहरों के लिए बस उपलब्ध होती है। इसके अलावा उंचेहरा और सतना बस स्टैंड हैं जो आर्ट इचौल से 6 और 33 किमी दूरी पर हैं। सतना में बड़ा बस स्टैंड है जहां से इंटर स्टेट बस भी मिल जाती हैं।
ट्रेन - आर्ट इचौल से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उंचेहरा है जो केवल 6 किमी दूर है। यहां केवल पैसेंजर ट्रेन रुकती हैं। दूसरा नजदीकी रेलवे स्टेशन मैहर जो मात्र 12 किमी की दूरी पर है। यहां से कुछ एक्सप्रेस भी मिल जाती हैं। आर्ट इचौल से 33 किमी दूर सतना बड़ा रेलवे स्टेशन है जहां से वाराणसी, हावड़ा, दिल्ली, मुंबई, जबलपुर, लखनऊ, पटना जैसे बड़े शहरों के लिए ट्रेन आसानी से मिल जाती है।
एयरपोर्ट - आर्ट इचौल से नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर है जो 175 किमी की दूरी पर है। जबलपुर एयरपोर्ट से दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों के लिए रोजाना फ्लाइट है।
ART ICHOL TICKET AND TIMING
आर्ट इचौल का टिकट की कीमत 80 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसके अलावा आर्ट इचौल घूमने के लिए टाइमिंग सुबह 9 बजे से लेकर शाम 7.30 बजे तक है। शाम के वक्त पर्याप्त लाइटिंग की व्यवस्था के कारण आर्ट इचौल घूमना और भी शानदार हो जाता है।
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