बहोरीबंद : कटनी के नजदीक स्थित ये शहर जो 2253 साल पुराने सम्राट अशोक के अभिलेख और 1600 साल पुराने कंकाली देवी मंदिर के लिए फेमस है
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| तिगवां में स्थित गुप्तकाल का कंकाली देवी मंदिर |
एमपी का एक-एक शहर शानदार और जानदार हैं। घूमने के लिए ढेर सारे ऑप्शन हैं। मध्यप्रदेश के नॉर्थ से लेकर साउथ तक और ईस्ट से लेकर वेस्ट तक सबकुछ अमेजिंग है। इतिहास से लेकर भूगोल और एडवेंचर से लेकर शानदार फूड एक नंबर है। इतिहास और ऐतिहासिक जगहों में रूझान रखने वाले लोगों के लिए बहोरीबंद एक बेहतरीन जगह है। एमपी के कटनी जिले से 50 किमी दूरी पर स्थित बहोरीबंद हजारों साल की दास्तान कहता है। बहोरीबंद भारत के उन शहरों में शुमार है जो हजारों साल से जीवित हैं और अपनी कहानी कह रह रहे हैं। सम्राट अशोक से लेकर आज तक बहोरीबंद ने कई दौर देखे हैं।
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| कंकाली देवी मंदिर के कलात्मक पिलर |
बहोरीबंद की दो जगह सबसे ज्यादा फेमस है पहली कंकाली देवी मंदिर और दूसरी अशोक का लघु शिलालेख। ये दोनों जगहें अलग-अलग समय की कहानी कहती हैं। जहां एक ओर कंकाली देवी मंदिर गुप्तकाल तो वही दूसरी ओर अशोक का लघु शिलालेख जो नाम से ही जाहिर की ये सम्राट अशोक के समय का है। बहोरीबंद छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा इतिहास का प्यारा सा नगीना है।
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| कंकाली देवी मंदिर में स्थित कालभैरव की प्रतिमा |
पहले बात करते हैं कंकाली देवी मंदिर की। कंकाली देवी मंदिर परिसर में ढह चुके मंदिरों को मिलाकर कुल 36 मंदिर हैं। इन 36 मंदिरों में कंकाली देवी का मंदिर सबसे अच्छी हालत में है। कंकाली देवी मंदिर भारत में शुरुआती हिंदू स्थापत्य कला का शानदार नमूना है। कंकाली देवी मंदिर भारत के सबसे पुराने जीवित मंदिरों में से एक है। ये मंदिर लगभग 1600 साल से पुराने हैं यानी 400-425 CE साल के हैं। तिगवां का मतलब है तीन गांव। टॉलमी ने बहोरीबंद को तोलाबाधा के नाम से पुकारा था।
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| मंदिर में स्थित शेषशायी विष्णु की मूर्ति |
कंकाली मंदिर बहोरीबंद के तिगवां गांव में स्थित है। एक ओर गांव के कच्चे घर और दूसरी ओर लगभग 1600 साल पुरानी विरासत है। एक बड़ी सी बाउंड्री वाल के अंदर मां कंकाली माता मंदिर स्थित है जिसके मुख्य द्वार के पास ही भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड लगा हुआ है जिससे यह पता चलता है कि यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्गत आता है। इस परिसर में कुल दो मंदिर है दोनों ही देवियों को ही समर्पित है। मंदिरों की विशेषता यह है कि दोनों के मुख विपरीत दिशा में है। मुख्य द्वार से अंदर जाते ही दाहिने हाथ की ओर बना मंदिर गुप्त काल का है। इस मंदिर की छत एकदम सपाट है जो गुप्तकाल की स्थापत्य कला का विशेष उदाहरण है।
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| मंदिर की दीवार पर उकेरी गई जैन तीर्थंकर की मूर्ति |
कंकाली माता मंदिर गुप्त काल का अद्भुत नमूना है। यह मंदिर एक चबूतरे पर बना हुआ है। जिसमें एक गर्भगृह और मंडप बना हुआ है। गर्भगृह में मां कंकाली की गुप्तकालीन प्रतिमा स्थापित है। मंडप की अंदरुनी छत पर खिले हुए कमल की आकृति दिखाई देती है। मंडप दो ओर से दीवार से सहारा लिए हुए है तथा पूर्व दिशा में कुल चार खंभे है जिनकी बनावट अत्यधिक आकर्षक है। चार खंभों में से एक आम के पेड़ को और दूसरा खजूर के पेड़ को दर्शाता है। मंडप की दीवारों पर एक ओर शेषशायी विष्णु भगवान की मूर्ति लगाई गई है और भगवान विष्णु की नाभि(navel) से एक कमल निकलता हुआ दिखाई दे रहा है जिस पर ब्रह्मा जी को बैठा हुआ दिखाया गया है। इसी प्रतिमा के ऊपर काल भैरव के विकराल रूप को दिखाया गया है। दस भुजाओं वाले नृत्य करते हुए कालभैरव की प्रतिमा अद्वितीय है।
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| कंकाली देवी मंदिर की अंदरूनी छत पर उकेरी गई कमल की आकृति |
मंडप में दूसरी दीवार में किनारे की ओर एक जैन तीर्थंकर की प्रतिमा है जो कमलासन पर विराजमान है। कमलासन के नीचे एक ओर एक सिंह है जिसे एक व्यक्ति नमन कर रहा है तथा दूसरी ओर सिंह से क्षमायाचना की मुद्रा में है। कमलासन के ऊपर मूर्ति के दोनों ओर चवन हिलाते और माला पहनाते व्यक्ति नजर आते है। प्रतिमा के शीर्ष पर तीन फन को फैलाएं हुए नाग दिखाई देते है तथा नाग के दोनों ओर घोड़े को साधते हुए घुड़सवार दिखाई दे रहे है। यह प्रतिमा कई मायनों में महत्वपूर्ण है जो बिना बोले ही कई शब्द कह रही है।
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| मंदिर परिसर में मंदिरों के अवशेष |
यह मंदिर हमें अपने गौरवशाली इतिहास के दर्शन कराता है। यह एक तांत्रिक गतिविधियों का केन्द्र रहा था। जिसमें देश-विदेश से लोग आते थे। दो मंदिरों के अलावा यहां अन्य मंदिरों या अन्य संरचना का भी ज्ञान होता है। यहां इतने सारे पुरावशेष रखें हुए है जिससे किसी वृहद आकार की संरचना को आकार दिया जा सकता है। खंभों पर एक लेख की जानकारी भी मिलती है। कहा जाता है कि ये किसी यात्री का लेख रहा होगा।
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| मंदिर के पिलर पर उकेरा गया लेख |
इन सबके अलावा इस मंदिर में देवी गंगा की मूर्ति है जो मगरमच्छ पर सवार हुए दर्शाया गया है। देवी यमुना को दर्शाया गया है जो सीताफल के पेड़ से सीताफल तोड़ रही हैं। खंभों पर हम शेर की आकृति देख सकते हैं। कई आर्कियोलॉजिस्ट का कहना है कि कंकाली देवी मंदिर पहले भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर था जो बाद में कंकाली देवी मतलब चामुंडा देवी को समर्पित कर दिया गया। कई इतिहासकार इसे सांची और उदयगिरि की गुफाओं के समय का बताते हैं। कई विद्वानों का कहना है कि यह मंदिर गुप्तकाल के भीतरगांव, भुमरा, नचना, एरन जैसे ऐतिहासिक जगहों के समकालीन है।
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| हजारों साल पहले पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर आकृति |
इस परिसर में एक और मंदिर है जो अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल रहा। मुख्य मंदिर के समीप ही एक मंदिर है जो देवी को समर्पित है। यह मंदिर पत्थर से निर्मित है। यह मंदिर एक दीवार से घिरा हुआ है जो पत्थर से बनी है जिसमें एक मुख्य द्वार को कलात्मक ढ़ंग से तराशा गया है। इस मंदिर की छत भी सपाट है और पूरी तरह पत्थर से निर्मित है। मुख्य द्वार से अंदर आने पर एक आंगन आता है जिसके बिल्कुल बीचोंबीच एक हवनवेदी है। यह मंदिर भी चबूतरे पर बना हुआ है। इसमें भी एक गर्भगृह और मंडप बना हुआ है। इसकी बनावट भी प्राचीन समझ आती है परंतु देखने पर ऐसा लगता है कि इसका जीर्णोद्धार किया गया है या ज्यादा पुराना नहीं है।
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| कंकाली देवी मंदिर में स्थित अन्य मंदिर |
इस मंदिर परिसर में ढेर सारे मंदिर के अवशेष नजर आते हैं। कहीं नजाकत से तराशे गए खंभे नजर आते है कहीं छोटे-छोटे मंदिरों के शिखर नजर आते हैं। पत्थरों पर उकेरी गई तरह-तरह की आकृतियां नजर आती है जिनमें कमल, गोलाकार लाइन, पत्थरों की दीवार के अवशेष नजर आते हैं। गुंबद की तरह नजर आने वाले कलात्मक अवशेष नजर आते हैं। मंदिर परिसर में जहां तक नजर जाती वहां तक सुंदर-सुंदर मंदिरों के अवशेष दिखाई देता है।
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| रूपनाथ धाम का प्राकृतिक नजारा |
दूसरी सबसे महत्वपूर्ण जगह है रूपनाथ धाम। विंध्याचल पर्वत की पार्श्व शृंखला कैमूर पहाड़ी में स्थित रूपनाथ धाम आंखों को सुकून देना वाला है। इसी रूपनाथ धाम में सम्राट अशोक का लघु शिलालेख है। पहाड़ी गिरता झरना और आसपास का हरा-भरा माहौल है। इस जगह की दो विशेषतायें हैं पहली आध्यात्मिक और दूसरी ऐतिहासिक। सबसे पहले हम ऐतिहासिकता की बात करते हैं यानी अशोक का लघु शिलालेख।
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| अशोक के शिलालेख के पास मौजूद सीता, राम और लक्ष्मण कुंड |
सम्राट अशोक ने आदेश को जन-जन पहुंचाने के लिए स्तंभलेख, शिलालेख, लघु शिलालेख का माध्यम अपनाया। इन शिलालेखों और स्तंभलेखों के माध्यम से अशोक अपने आदेश और संदेश के लोगों तक पहुंचाता था। रूपनाथ में स्थित लघु शिलालेख सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म में ढ़ाई साल और संघ में प्रवेश के एक वर्ष के बाद खुदवाया गया था। रूपनाथ में झरने बाये तरफ छोटी सी चट्टान पर अभिलेख लिखा गया है। इस अभिलेख में 5 लाइन में लिखा गया है। ये इअभिलेख पाली भाषा में है जो ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। इससे पता चलता है कि उस समय जब अभिलेख लिखा गया था तब आम बोलचाल की भाषा पाली थी।
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| पाली भाषा में लिखा सम्राट अशोक का लघु शिलालेख |
यहां लिखे पाली भाषा में अभिलेख का हिंदी अनुवाद इस तरह है -
' देवों के प्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं , ढ़ाई वर्ष से अधिक हुए कि मैं उपासक हूं (अर्थात् मैंने बौद्ध धर्म में प्रवेश किया है) परंतु मैंने कुछ विशेष काम नहीं कर पाया हूं। एक साल से अधिक हुआ होगा मैंने संघ में प्रवेश किया है और उत्तम रूप से कार्य किया है। इस बीच जम्बूद्वीप में जो देवता अप्रचलित हो गए थे उनको मैंने प्रचलित कर दिया है (अर्थात् अपने धर्म को ग्रहण कर लिया है) यह परिश्रम का फल है। प्रभुता से प्राप्त नहीं हो सकता है। यदि क्षुद्र व्यक्ति भी चेष्टा करे तो वह भी विपुल स्वर्ग सुख पा सकता है। इसी उद्देश्य से यह घोषित किया जाता है , ताकि छोटे और बड़े सब चेष्टा करने लगें और हमारे निकटवर्ती राजा लोग भी उद्योग करें। चिरकाल तक करते रहें। इसी उद्देशय का प्रसार हो, इसकी विपुल वृद्धि हो जाये। अंत में डेवढ़ी वृद्धि हो जाये। यही बात पर्वतों पर लिखाई जाये और राज्य में निकट या दूर जहां-जहां शिला स्तंभ हो उन पर भी लिखा जाये। वे हमारे प्रयास के 256 वें दिन इस आदेश की घोषणा की जाये। '
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इस लघु शिलालेख को आज से 2253 साल पहले लिखवाया गया था। इसका मतलब है कि ये लघु शिलालेख 232 CE का है जो ईसा से 232 साल पुराना है।
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| रूपनाथ धाम में स्थित पंचमुखी शिव मंदिर |
इस जगह की धार्मिक पक्ष की बात करें तो यहां शिव का पंचमुखी मंदिर है। जो ज्यादा प्राचीन है। इसके अलावा यहां झरने से बहने वाले पानी से वाले कई कुंड हैं जिन्हें रामकुंड, सीताकुंड और लक्ष्मण कुंड के नाम से जाना जाता है। लोक मान्यतायें हैं कि यहां एक गुफा है जो कटाव धाम में जाकर मिलती है।
रूपनाथ धाम में मेला
(MELA AT ROOPNATH DHAM)
मकर संक्राति त्योहार के समय यहां सात दिनों के लिए मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं। ये मेला गांव की आजीविका का साधन है। इस मेले में गुड़ और गुड़ से बनी खाने के कई सामान मिलते हैं। इसके अलावा इस मेले में रोजमर्रा के भी सामान भी मिलते है जो लोगों के काम आता है।
जैन अतिशय क्षेत्र है बहोरीबंद, यहां मिली थी एक हजार साल पुरानी मूर्ति
बहोरीबंद जैन अनुयायियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहां से जैनों के 16वें तीर्थंकर शांतिनाथ की 1000 साल पुरानी 16 ऊंची मूर्ति मिली थी। इस मूर्ति का निर्माण कल्चुरि काल में गयाकर्ण देव ने करवाया था। इतिहासकारों का मानना है कि इसका काल 1125 CE है। साल 1901 में तीर्थंकर शांतिनाथ की मूर्ति को उत्खनन में बाहर निकाला गया। कुछ विद्वानों का मानना है कि पहले यहां 36 जैन मंदिर हुआ करते थे तब यहां राष्ट्रकूट वंश का राज्य हुआ करता था।
बहोरीबंद जाने का सही समय
(BEST TIME TO VISIT IN BAHORIBAND)
बहोरीबंद जाने का सही समय ठंड का मौसम है क्योंकि इस मौसम में तापमान कम होने के कारण टूरिस्ट आसानी से घूमने जा सकते हैं। अक्टूबर से मार्च तक मां कंकाली देवी मंदिर(तिगवां) और रुपनाथ घूमने का सही समय है। गर्मी के मौसम में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार चले जाता है वहीं बारिश के मौसम में बारिश होने से ट्रैवल में खलल पड़ .सकती है।
बहोरीबंद कैसे पहुंचे
(HOW TO REACH BAHORIBAND)
एयरपोर्ट - बहोरीबंद से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट जबलपुर एयरपोर्ट है। जबलपुर एयरपोर्ट से दिल्ली, मुंबई, इंदौर, हैदराबाद जैसे शहरों के लिए फ्लाइट हैं। बहोरीबंद से जबलपुर एयरपोर्ट 90 किमी दूर स्थित है।
ट्रेन - बहोरीबंद से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन स्लीमनाबाद है जो 24 किमी दूर है, दूसरा नजदीकी स्टेशन सिहोरा जो 26 किमी दूर है। इन दोनों स्टेशन पर पैसेंजर और कुछ एक्सप्रेस को छोड़कर ज्यादा ट्रेन नहीं रुकती हैं। बहोरीबंद के पास सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन कटनी जंक्शन है जो बहोरीबंद से 56 किमी दूर स्थित है। कटनी जंक्शन से देश के किसी भी हिस्से के लिए ट्रेन आसानी मिल जाती है।
बस - बहोरीबंद में बस स्टैंड है लेकिन आसपास के लिए कुछ गांव और शहरों के लिए बस मिल पाती है। बहोरीबंद के पास सबसे बड़ा बस स्टैंड कटनी है यहां से एमपी के अलग-अलग शहरों के अलावा दूसरे राज्यों के लिए भी बस मिल जाती है।
बहोरीबंद के पास घूमने के लिए शानदार टूरिस्ट प्लेस
NEAREST TOURIST PLACES
बहोरीबंद के पास घूमने के लिए ढेर सारे टूरिस्ट प्लेस हैं। बहोरीबंद से नजदीकी टूरिस्ट प्लेस में कटाव धाम, बिलहरी, भैंसाघाट, भेड़ाघाट, धुंआधार फॉल्स, बांधवगढ़ नेशनल पार्क, बांदकपुर मंदिर, कुंडलपुर जैन मंदिर, मैहर में शारदा देवी मंदिर, पनपठा अभ्यारण्य, कान्हा किसली नेशनल पार्क, घुघवा फॉसिल नेशनल पार्क, भारत का केंद्र बिंदु करौंदी (मनोहर गांव) है।
NOTE - यदि आप रुपनाथ और मां कंकाली माता मंदिर(तिगवां) घूमने चाहते है तो निजी वाहन का अच्छा विकल्प है। कटनी शहर से आपको किराए पर वाहन आसानी से उपलब्ध हैं।
BY_vinaykushwaha














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